Friday, May 27, 2011

नक़ाब

उनकी दीद की तमन्ना लिए हमने आँखें मूंद लीं,
और वो ख्वाब में भी आए, पर नक़ाब ओढ़ कर;

इज़हार-ए-मोहब्बत करना था सारे-आम चौक पर,
बमुश्किल वो खिड़की पर आए, पर नक़ाब ओढ़ कर;

मर गये हम, दीद की तमन्ना में आँखें खुली रहीं,
वो शामिल थे मेरे जनाज़े में, पर नक़ाब ओढ़ कर;

ख़ुदा से दो पल माँगा कि रोता चेहरा ही देख लें,
वो रोए मेरी कब्र पर, पर नक़ाब ओढ़ कर