Monday, September 20, 2010

मतलबी दुनिया

दुनिया मतलबी, लोग मतलबी, लोगों के मिलने का अंदाज़ मतलबी;
धर्म मतलबी कर्म मतलबी, सारे रीति-रिवाज़ मतलबी.

अंदर से खोखली है ये दुनिया, मुस्कुराते चेहरे, मन में गालियाँ;
ध्यान लगा है खर्च जोड़ने में, पूजा की सजी हैं थालिया.

सम्मान मतलबी संस्कार मतलबी, पूर्वजों का आभार मतलबी;
पुण्य मतलबी, पाप मतलबी, पापी पर गिरती गाज़ मतलबी.

सच मतलबी झूठ मतलबी, सर पर होती खाज मतलबी;
आप मतलबी मैं मतलबी, हमारा परसो कल और आज मतलबी.

अंदर से आती आवाज़, हो जाउ सन्यासी छोड़ कर ये मतलबी समाज,
करूँ मानवता की सेवा, रखूँ इंसानियत की लाज;
मनन चिंतन कर होता है आभास...
अंदर की ये आवाज़ मतलबी, अंदर की आवाज़ मतलबी...

Friday, July 23, 2010

कौन हूँ मैं?

ढूंढता था कब से खुद को, पूछता था कौन हूँ मैं?
यहाँ नहीं कोई मोल मेरा, लगता है गौण हूँ मैं.
पर जबसे मिला हूँ तुझसे, बदला है जीवन मेरा,
अब लगता है मेरी भी है कुछ पहचान,
देखता हूँ तुझमे खुद को, जानता हूँ कौन हूँ मैं.

हमारी अधूरी मुलाकात

शाम छोटी सी है रात है भारी;
अधूरी है हर मुलाकात हमारी.

यूँ तो अक्सर मिलते रहे हम तुम,
बातें कई की हमने तुमसे, तुमने हमसे;
जाने कब होगा मिलन हमारा,
जाने कब होगी बात हमारी.
शाम छोटी सी है रात है भारी;
अधूरी है हर मुलाकात हमारी.

यूँ तेरा आना, कुछ पल रुक कर चले जाना,
कभी समाज, कभी घर वाले तो कभी कोई और बहाना;
तेरे आते ही चले जाने से,
पूरी ना हो पाती मुलाकात हमारी.
शाम छोटी सी है रात है भारी;
अधूरी है हर मुलाकात हमारी.

Friday, May 7, 2010

वो मुस्कुराता हुआ चेहरा...

एक दिन मैं परेशान था, ढूँढ रहा था समस्याओं का हल;
जीवन की परेशानियों को सहने के लिए, कहाँ से मिले बल?
समस्याओं से बचाव के लिए, लगा उम्मीद का पहरा;
जब याद आया मुझे, वो मुस्कुराता हुआ चेहरा...

वही मारा-मारी, वही दौड़-भाग, वही रोज़ के झंझट;
जिंदगी की सूरत खराब ना हो, कोई ओढ़ा दे इसे घूँघट;
आत्मीयता और दोस्ती की रोशनी से, दूर हुआ निराशा गहरा,
जब याद आया मुझे, वो मुस्कुराता हुआ चेहरा...

मोबाइल में कंपन हुई, हुआ मुझे एक अंदेशा;
चेहरे पे मुस्कान ले आई, उसका एक और संदेशा;
कभी-कभी होने वाली बातें और संदेशों की बाढ़ से,
ये दोस्ती का रिश्ता हुआ और भी गहरा;
आज यूँ ही याद आया मुझे, वो मुस्कुराता हुआ चेहरा...

Monday, April 5, 2010

माँ

एक दिन यूँ हीं मेरे मन में ख्याल आया,
जिसने ये दुनिया बनाई उसने सबसे सुंदर क्या बनाया?
ये सवाल, जवाब भी साथ लाया,
स्वतः मुझे माँ का ख्याल आया..

माँ- भगवान की सबसे सुंदर रचना,
अस्तित्व में ढाली गयी सबसे प्यारी कल्पना,
जब भी ममता, स्नेह, सुरक्षा, दायित्व पर विचार आया,
स्वतः मुझे माँ का ख्याल आया..

रचना तो हो गयी संसार की,
भगवान को सब बच्चे प्यारे लगे,
हो पशु, पक्षी, मनुष्य या कोई भी जीव,
किसने भगवान को सब तक पहुँचाया?
स्वतः मुझे माँ का ख्याल आया..

Monday, February 1, 2010

दो दोस्त

One day, my room mate Vishal's friend Zeeshan came to our room. They were recalling their MBA days and I was just observing.. My observations are....


दो दोस्त मिले हैं कई दिनों बाद,
लगे हैं एक दूसरे की टांग खींचने में;
गलियाँ पे गलियाँ पड़ रही हैं,
लगे हैं रिश्ते की बगिया सिंचने में.

तेरी गर्ल फ़्रेंड कुछ ज़्यादा ही ख्याल रखती है,
तुम्हे लेकर बड़ी पोसेसिव है;
उसका केयर करने का ये अंदाज,
बड़ा ही एक्सेसिव है;
उसका चेहरा देखा था?
जब अचानक मैं पहुँच गया था,
लग गयी थी अपनी आँखें मिंचने में.
दो दोस्त मिले हैं कई दिनों बाद,
लगे हैं रिश्ते की बगिया सिंचने में.

तुझे नई लगता तू कुछ ज़्यादा बोल रहा है,
लगता है थोड़ी चढ़ गयी है;
साले! खंभा लगा चुके हैं घंटा भर में,
अब क्या लगे हो बहाना ढूँढनें मे?
दो दोस्त मिले हैं कई दिनों बाद,
लगे हैं रिश्ते की बगिया सिंचने में.

Monday, January 25, 2010

उम्मीद

खुद से लड़ता, टकराता, जूझता हर इंसान यहाँ,
अपनी बिखरी जिंदगी समेटने मे लगा है;
ऐसे में सोचने, समझने, जानने की उलझन में,
वो क्यूँ रात रात भर जगा है;

अपनों की खोज में है वो,
लोगों मे अपनों को ढूंढता है,
और लोगों ने अपना कह कर,
बार बार, हर बार उसे ठगा है.

उसकी मति मारी गयी है,
वो पागल है क्या?
इस पराई दुनिया में,
कौन किसका सगा है?

लेकिन...
उस पागल की उम्मीद कुछ खास है,
अंधेरे में भी रोशनी की आस है;
उसकी सपनों में साहस है, आशा है, बदलाव है,
और वो इन सपनों को सच करने में लगा है.

Tuesday, January 19, 2010

उलझा मन

हम मिलकर भी नहीं मिलते, एक दूसरे को जान कर भी अनजान हैं,
पास होकर भी दूरी हैं दरमियाँ, साथ तो हैं पर जैसे एक दूसरे के मेहमान हैं;
वैसे मिले तो हैं हम कई बार, पर हमें अब भी पहली मुलाकात का आसार है,
बातें तो कई की हैं हमने, पर वो अब कुछ कहें इसका दोनों को इंतजार है.

उनकी याद नया जीवन दे जाती है, अब सब कुछ अच्छा सा लगता है,
दिन में चलते हुए ख्वाब देखते हैं हम, अभी सब सच्चा सा लगता है;
शायद उधर भी यही आलम है, वो भी सपनें देखती होगी,
यही सोच कर यही मान कर, सपनों की ये दुनिया गुलजार है.
बातें तो कई की हैं हमने, पर वो अब कुछ कहें इसका दोनों को इंतजार है.