खुद से लड़ता, टकराता, जूझता हर इंसान यहाँ,
अपनी बिखरी जिंदगी समेटने मे लगा है;
ऐसे में सोचने, समझने, जानने की उलझन में,
वो क्यूँ रात रात भर जगा है;
अपनों की खोज में है वो,
लोगों मे अपनों को ढूंढता है,
और लोगों ने अपना कह कर,
बार बार, हर बार उसे ठगा है.
उसकी मति मारी गयी है,
वो पागल है क्या?
इस पराई दुनिया में,
कौन किसका सगा है?
लेकिन...
उस पागल की उम्मीद कुछ खास है,
अंधेरे में भी रोशनी की आस है;
उसकी सपनों में साहस है, आशा है, बदलाव है,
और वो इन सपनों को सच करने में लगा है.
bahut achha.
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