ढूंढता था कब से खुद को, पूछता था कौन हूँ मैं? यहाँ नहीं कोई मोल मेरा, लगता है गौण हूँ मैं. पर जबसे मिला हूँ तुझसे, बदला है जीवन मेरा, अब लगता है मेरी भी है कुछ पहचान, देखता हूँ तुझमे खुद को, जानता हूँ कौन हूँ मैं.
शाम छोटी सी है रात है भारी; अधूरी है हर मुलाकात हमारी.
यूँ तो अक्सर मिलते रहे हम तुम, बातें कई की हमने तुमसे, तुमने हमसे; जाने कब होगा मिलन हमारा, जाने कब होगी बात हमारी. शाम छोटी सी है रात है भारी; अधूरी है हर मुलाकात हमारी.
यूँ तेरा आना, कुछ पल रुक कर चले जाना, कभी समाज, कभी घर वाले तो कभी कोई और बहाना; तेरे आते ही चले जाने से, पूरी ना हो पाती मुलाकात हमारी. शाम छोटी सी है रात है भारी; अधूरी है हर मुलाकात हमारी.