Monday, June 6, 2011

शीशम का पेड़

वो रिंग रोड की डिवाइडर पे खड़ा शीशम का पेड़,
आधा काला आधा हरा है;
ज़हरीले धुँए ने सेहत तो बिगाड़ दी है इसकी,
पर आज भी ये जीवन से भरा है.

ये चुपचाप खड़ा पेड़ हमेशा चुप नहीं रहता,
मद्धम चलती हवा के संग झूमता है, खेलता है;
इस हवा के गंदे होने का इसे शिकन नहीं ज़रा है,
आज भी ये जीवन से भरा है.

विषम स्थितियों से जूझता ये पेड़ जीवन का प्रतीक है,
धुँआ कठिनाइयों का और गाड़ियाँ इन कठिनाइयों के कारक;

इस शीशम के पेड़ से सटा एक और पेड़ है,
मुरझाया और गिरा हुआ,
धुँए ने इसे मार डाला है,
ये गिरा हुआ पेड़ उन कमजोर लोगों का प्रतीक है जो हार गये हैं...
ये मैं नहीं हूँ, कभी भी नहीं

Friday, May 27, 2011

नक़ाब

उनकी दीद की तमन्ना लिए हमने आँखें मूंद लीं,
और वो ख्वाब में भी आए, पर नक़ाब ओढ़ कर;

इज़हार-ए-मोहब्बत करना था सारे-आम चौक पर,
बमुश्किल वो खिड़की पर आए, पर नक़ाब ओढ़ कर;

मर गये हम, दीद की तमन्ना में आँखें खुली रहीं,
वो शामिल थे मेरे जनाज़े में, पर नक़ाब ओढ़ कर;

ख़ुदा से दो पल माँगा कि रोता चेहरा ही देख लें,
वो रोए मेरी कब्र पर, पर नक़ाब ओढ़ कर

Sunday, April 10, 2011

हम अन्ना हज़ारे हैं...

स्वतंत्र भारत में जन्मा था मैं,
सोचता था कितने अच्छे हैं भाग हमारे;
थोड़ी समझ आई तो एहसास हुआ.
इस आज़ाद मीठी झील में छुपे हैं बंधन के सागर खारे;
भ्रष्टाचार ने बाँध रखा है मेरे भारत को,
इसे आज़ाद करा दो अन्ना हज़ारे

हमने तो भ्रष्टाचार को जीवन का हिस्सा मान लिया था,
करोड़ों के घपलों को सच्चाई और पारदर्शी जनसेवा को किस्सा मान लिया था;
परिवर्तन की एक आँधी सी आती दिखती है,
ये उड़ा ले जाएगी सारे घपलों के मूल को,
अब भी वक़्त है, हे अवसरवादियों!
पहचान लो अपनी भूल को.

जान लो जो दुस्कर्म तुम्हारे हैं,
कोई भ्रष्टाचारी नही बचेगा क्योंकि अब "सभी भारतीय अन्ना हज़ारे हैं"
हां! "हम अन्ना हज़ारे हैं."