Wednesday, October 16, 2013

जिंदगी एक सड़क

जिंदगी एक सीधी सड़क नहीं,
गर सड़क भी है तो कई मोड़ हैं इसमें;
ये महामार्ग है अपने देश की,
कभी समतल तो कभी जोड़ हैं इसमें.

आभास नहीं होता है लेकिन,
कई और भी सड़कें मिलती रही हैं;
सूर्योदय भी होता है यहाँ,
शामें भी यहाँ ढलती रही हैं;
कई राहों की कई तरह से कई जगहों पर जोड़ हैं इसमें.
जिंदगी एक सीधी सड़क नहीं,
गर सड़क भी है तो कई मोड़ हैं इसमें;

सामने से कई सड़कें जुदा भी होती रही हैं,
तो क्या गर मन में दुख होता है?
सड़क तो चलती रहेगी आगे ही आगे,
मुडेगी उधर, जिधर हवा का रुख़ होता है;
चलते हुए हम भूलें नहीं, नियमों के कई तोड़ हैं इसमें.
जिंदगी एक सीधी सड़क नहीं,
गर सड़क भी है तो कई मोड़ हैं इसमें;

कभी कभी कोई समानांतर सड़क एक उम्मीद दिलाती है,
राह मनोरंजक कर निराशा हटाती है;
मिलेगी या नहीं इस उधेड़बुन मे उलझाती है,
बिना हल किए कई सवाल सुलझाती है;
मंज़िल का पता नहीं और इसे पाने की अजीब सी होड़ हैं इसमें.
जिंदगी एक सीधी सड़क नहीं,
गर सड़क भी है तो कई मोड़ हैं इसमें;
ये महामार्ग है अपने देश की,
कभी समतल तो कभी जोड़ हैं इसमें.

Wednesday, October 9, 2013

उलझन

ये उलझन कुछ अजीब सी है, रिश्तों की, बेरिश्तों की.
जीवन एक नदी है सबकी, किस्तों की, बेकिस्तों की.

खुशनसीब हैं वो जिन्होनें अपनी किस्ती पहचान ली,

उस किस्ती ने भी उसे पाना है, ये जान ली,
संग चलना है आमरण, दोनों ने ये ठान ली;
पार कर लेंगे वो ये नदी, नहीं चाह फरिश्तों की,
जीवन एक नदी है सबकी, किस्तों की, बेकिस्तों की.

उन बदनसीबों से हमदर्दी मेरी अपार,

जो गैर की किस्ती में अब तक हैं सवार;
कोशिश तो है पूरी, लेकिन ना होगी ये नदिया पार,
ग्यात है उनको भी, ज़रूरत है कहीं और उन 'दोस्तों' की,
जीवन एक नदी है सबकी, किस्तों की, बेकिस्तों की.

हमदर्दी का पात्र, मैं भी बदकिस्मत अब तक हूँ,

सवार दूसरों की किस्ती में यूँही मैं जब तक हूँ;
जाने ऐसे हीं खुश, बेपरवाह मैं कब तक हूँ;
उम्मीद, ये कुंजी है खुशियों भरी बस्तो की,
जीवन एक नदी है सबकी, किस्तों की, बेकिस्तों की 

Friday, May 24, 2013

ऐसा ही हूँ मैं

ऐसा ही हूँ मैं!
हाँ, बिल्कुल ऐसा, जैसा दिख रहा हूँ,
हंस रहा हूँ, बोल रहा हूँ, लिख रहा हूँ

समझदार हूँ कुछ ज़्यादा, दोस्त हूँ सबका,

अच्छे लोगों से घिरा हुआ, वादे का पक्का;
कभी कभी कुछ अधिक बोल जाता हूँ,
लोग कहते हैं, मैं इंसान हूँ अच्छा
अपनाया है सबने, जैसा भी हूँ मैं;
ऐसा ही हूँ मैं!

देर करने की आदत बचपन से है,

दोस्तों को इसकी शिकायत उन्नीस सौ छप्पन से है;
दो हज़ार तेरह में भी नही बदला मैं,
जबकि बदलने की चाहत लड़कपन से है
बदल ना पाया  खुद को कैसा भी हूँ मैं;
ऐसा ही हूँ मैं!

माँ पिताजी का आदर्श बेटा, भाभियों का दुलारा देवर,

भाई बहनों का प्यारा भैया, सबने चढ़ा रखा है सर पर;
दोस्तों का कमीना दोस्त, पार्टी का बिंदास डाँसर,
घंटों फोन पे चिपके रहना, हर वीकेंड किसी और के घर
वो घुमंतू होते हैं ना? उन जैसा ही हूँ मैं,
ऐसा ही हूँ मैं!

अब चाहता हूँ मैं थोड़ा बदल जाऊं,

बहुत भटक चुका अब संभल जाऊं;
जीवन का सुनहरा अध्याय शायद पूरा हो चुका,
अगले अध्याय में हीरे सा जड़ जाऊं
बदलने को तत्पर फिर वैसा ही हूँ मैं,
ऐसा ही हूँ मैं!
हां, ऐसा ही हूँ मैं!

Sunday, May 19, 2013

मेरी छोटी बहन

प्यार है स्नेह है, दिल के करीब है;
मिला मैं उससे, ये मेरा नसीब है.
बातों में घुली मिश्री गहन है,
वो मेरी छोटी बहन है.

वो बचपन से हीं बड़ी है,
चॉकलेट और गुडियों के लिए खूब लड़ी है;
मुझे समझाया उसने खूब है,
पर गणित तो मुझसे ही पढ़ी है :)
उसकी आत्मीयता को मेरा नमन है,
वो मेरी छोटी बहन है.

भावुक हूँ, थोड़ा उत्साहित भी,
जीवन का एक मोड़ सामने है;
जीवन के दो भाग दो भिन्न धागों की तरह,
धागों को मिलाने वाला जोड़ सामने है.
विश्वास कि नया धागा समर्थक और प्रसन्न है,
वो मेरी छोटी बहन है.

लिखना तो बहुत कुछ है मुझे,
पर सब लिखना भी ज़रूरी नहीं;
बातें वो बिना बोले भी समझ जाती है,
हमेशा दिखना भी ज़रूरी नही.
वो मेरी भावनाओं का दर्पण है,
वो मेरी छोटी बहन है.

Sunday, April 28, 2013

मुझे बच्चा बना दो

समझदारी ले लो मेरी, मुझे सच्चा बना दो,
भगवान फिर से मुझे बच्चा बना दो.

फिर से मुझे खिलौने से खेलने दो,
फिर से कुछ कंचे उधार लेने दो;
फिर से मैं दौड़ू कटी पतंग के पीछे,
फिर से धूल से सने कपड़ों में घर लौटने दो;
फिर से उसकी चोटी खींचकर भागने मे अच्छा बना दो,
भगवान फिर से मुझे बच्चा बना दो.

ऊब चुका हूँ, हो कर समझदार,
फिर हराना है भाई को बन कर लाचार,
फिर तोड़ने हैं नदी पार कर मीठे बेर,
खाना है पेड़ पे चढ़ कर ईमली मजेदार,
फिर से तोड़कर आम कच्चा खिला दो,
भगवान फिर से मुझे बच्चा बना दो.

नही जाना मुझे फिर से काम पर,
नही भटकना बेवजह शॉपिंग की शाम पर;
नही चाहिए इंतज़ार पहली तारीख का,
नही करनी कलमबाज़ी बजट के नाम पर;
बस रोज़ पापा से अट्ठन्नी या सिक्का दिला दो,
भगवान फिर से मुझे बच्चा बना दो.

मुश्किल है निभाना ये अनोखा नियम,
एक हाथ देना दूसरे हाथ लेने का चलन;
सभी खेल रहे हैं जीत सभी को चाहिए,
हो व्यतिगत संबंध या व्यावसायिक जीवन;
इस खेल में मुझे खिलाड़ी कच्चा बना दो
भगवान फिर से मुझे बच्चा बना दो.

समझदारी ले लो मेरी, मुझे सच्चा बना दो,
भगवान फिर से मुझे बच्चा बना दो.

Friday, February 1, 2013

जाने क्यूँ उसका इंतजार है...

मैं ये जानती हूँ कि अब वो मेरा नहीं,
फिर भी जाने क्यूँ मुझे उसका इंतजार है

वो... जिसने मुझे बेपरवाह हसाया,
मैंने मेरी मुस्कुराहट अपने होठों पे पाया;
जिसके साथ होने से मैं दुनिया से लड़ गयी,
वो कोई और जहाँ था, ये कोई और संसार है
फिर भी जाने क्यूँ मुझे उसका इंतजार है

मैं उसे भूल जाउ, वो ये कह चुका है,
कोपल पर ठहरा पानी अब बह चुका है;
वो अब किसी और की मुस्कुराहट पर खुश है,
अब उसे किसी और से प्यार है
फिर भी जाने क्यूँ मुझे उसका इंतजार है

मुझे पता है, मैं खुद को ठग रही हूँ,
किसी को पागल तो किसी को बेवकूफ़ लग रही हूँ;
वो मुझे चाहे ना चाहे ये उसकी मर्ज़ी है,
मैं चाहती रहूंगी उसे ये मेरा अधिकार है
पता नही क्यूँ पर मुझे उसका इंतजार है...