खुद से लड़ता, टकराता, जूझता हर इंसान यहाँ,
अपनी बिखरी जिंदगी समेटने मे लगा है;
ऐसे में सोचने, समझने, जानने की उलझन में,
वो क्यूँ रात रात भर जगा है;
अपनों की खोज में है वो,
लोगों मे अपनों को ढूंढता है,
और लोगों ने अपना कह कर,
बार बार, हर बार उसे ठगा है.
उसकी मति मारी गयी है,
वो पागल है क्या?
इस पराई दुनिया में,
कौन किसका सगा है?
लेकिन...
उस पागल की उम्मीद कुछ खास है,
अंधेरे में भी रोशनी की आस है;
उसकी सपनों में साहस है, आशा है, बदलाव है,
और वो इन सपनों को सच करने में लगा है.
Monday, January 25, 2010
Tuesday, January 19, 2010
उलझा मन
हम मिलकर भी नहीं मिलते, एक दूसरे को जान कर भी अनजान हैं,
पास होकर भी दूरी हैं दरमियाँ, साथ तो हैं पर जैसे एक दूसरे के मेहमान हैं;
वैसे मिले तो हैं हम कई बार, पर हमें अब भी पहली मुलाकात का आसार है,
बातें तो कई की हैं हमने, पर वो अब कुछ कहें इसका दोनों को इंतजार है.
उनकी याद नया जीवन दे जाती है, अब सब कुछ अच्छा सा लगता है,
दिन में चलते हुए ख्वाब देखते हैं हम, अभी सब सच्चा सा लगता है;
शायद उधर भी यही आलम है, वो भी सपनें देखती होगी,
यही सोच कर यही मान कर, सपनों की ये दुनिया गुलजार है.
बातें तो कई की हैं हमने, पर वो अब कुछ कहें इसका दोनों को इंतजार है.
पास होकर भी दूरी हैं दरमियाँ, साथ तो हैं पर जैसे एक दूसरे के मेहमान हैं;
वैसे मिले तो हैं हम कई बार, पर हमें अब भी पहली मुलाकात का आसार है,
बातें तो कई की हैं हमने, पर वो अब कुछ कहें इसका दोनों को इंतजार है.
उनकी याद नया जीवन दे जाती है, अब सब कुछ अच्छा सा लगता है,
दिन में चलते हुए ख्वाब देखते हैं हम, अभी सब सच्चा सा लगता है;
शायद उधर भी यही आलम है, वो भी सपनें देखती होगी,
यही सोच कर यही मान कर, सपनों की ये दुनिया गुलजार है.
बातें तो कई की हैं हमने, पर वो अब कुछ कहें इसका दोनों को इंतजार है.
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