साल के अंतिम महीनों में,
जब ठंढ अधिक बढ़ जाती है;
चाहत गर्म सरसो तेल के मालिश की,
दवाइयाँ कुछ काम ना आती है;
जब बदली हुई हर चीज़ हमें सताती है,
तब माँ अधिक याद आती है!
जब रेस्टोरेंट का मसालेदार खाना,
जब ठंढ अधिक बढ़ जाती है;
चाहत गर्म सरसो तेल के मालिश की,
दवाइयाँ कुछ काम ना आती है;
जब बदली हुई हर चीज़ हमें सताती है,
तब माँ अधिक याद आती है!
जब रेस्टोरेंट का मसालेदार खाना,
हम रोज़ बेमन से खाते हैं;
नान, शाही, कड़ाही, रारा,
हमको कतई ना भाते हैं;
जब पड़ोसी आंटी दाल के छौंक की खुश्बू फैलाती है,
तब माँ अधिक याद आती है!
जब गुस्सा किसी पर आता है,
नान, शाही, कड़ाही, रारा,
हमको कतई ना भाते हैं;
जब पड़ोसी आंटी दाल के छौंक की खुश्बू फैलाती है,
तब माँ अधिक याद आती है!
जब गुस्सा किसी पर आता है,
हमें कोई समझ ना पाता है;
हमसे बड़ा-छोटा, हर कोई,
हमें समझदारी का ठेका दे जाता है;
जब लिपट कर रोने को तकिया हीं हाथ आती है,
तब माँ अधिक याद आती है!
हमसे बड़ा-छोटा, हर कोई,
हमें समझदारी का ठेका दे जाता है;
जब लिपट कर रोने को तकिया हीं हाथ आती है,
तब माँ अधिक याद आती है!
वो गोद में उसके सर रखते हीं,
सारी थकान का मिट जाना;
वो मेरा धूल धूल हो घर आना,
मुझे जबरन बिठा कर खाना खिलाना;
वो मेरे लिए पापा से लड़ना,
बाद में बैठ कर मुझे समझाना;
वो लोरी, वो डाँट, वो दुलार, वो प्यार,
कभी छड़ी लेकर मेरे पीछे भागना;
जब एलबम की एक पुरानी फोटो मुझे रुला जाती है,
तब माँ अधिक याद आती है!
सारी थकान का मिट जाना;
वो मेरा धूल धूल हो घर आना,
मुझे जबरन बिठा कर खाना खिलाना;
वो मेरे लिए पापा से लड़ना,
बाद में बैठ कर मुझे समझाना;
वो लोरी, वो डाँट, वो दुलार, वो प्यार,
कभी छड़ी लेकर मेरे पीछे भागना;
जब एलबम की एक पुरानी फोटो मुझे रुला जाती है,
तब माँ अधिक याद आती है!
अपने घर से दूर इस शहर में,
अब माँ अधिक याद आती है!