Wednesday, October 9, 2013

उलझन

ये उलझन कुछ अजीब सी है, रिश्तों की, बेरिश्तों की.
जीवन एक नदी है सबकी, किस्तों की, बेकिस्तों की.

खुशनसीब हैं वो जिन्होनें अपनी किस्ती पहचान ली,

उस किस्ती ने भी उसे पाना है, ये जान ली,
संग चलना है आमरण, दोनों ने ये ठान ली;
पार कर लेंगे वो ये नदी, नहीं चाह फरिश्तों की,
जीवन एक नदी है सबकी, किस्तों की, बेकिस्तों की.

उन बदनसीबों से हमदर्दी मेरी अपार,

जो गैर की किस्ती में अब तक हैं सवार;
कोशिश तो है पूरी, लेकिन ना होगी ये नदिया पार,
ग्यात है उनको भी, ज़रूरत है कहीं और उन 'दोस्तों' की,
जीवन एक नदी है सबकी, किस्तों की, बेकिस्तों की.

हमदर्दी का पात्र, मैं भी बदकिस्मत अब तक हूँ,

सवार दूसरों की किस्ती में यूँही मैं जब तक हूँ;
जाने ऐसे हीं खुश, बेपरवाह मैं कब तक हूँ;
उम्मीद, ये कुंजी है खुशियों भरी बस्तो की,
जीवन एक नदी है सबकी, किस्तों की, बेकिस्तों की 

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